जानिए अंतरिक्ष के दानव ब्लैक होल के बारे में?

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ब्लैक होल एक विशालकाय दानव

ब्लैक होल (कृष्ण विवर) अंतरिक्ष में घूमता एक ऐसा दानव है, जो अपने रास्ते में आने वाली हर वस्तु को निगल लेता है। एक बार जो इसमें चला जाए, फिर वो कभी लौटकर वापिस नहीं आता। यहाँ तक कि प्रकाश भी इसमें समाहित होने के बाद निकल नहीं पाता। सबसे रोचक बात यह है कि कृष्ण विवर में समय का कोई वजूद नहीं है।

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ब्लैक होल भौतिकी के नियमों को चुनौती देता है। भौतिकी के जो नियम आज हमारी विज्ञान को तरक्की पर तरक्की दे रहे है, वो नियम इसमें काम नहीं करते। कृष्ण विवर इसलिए भी ज्यादा खतरनाक है क्योंकि यह अपने आस-पास की वस्तुओं को मजबूत गुरुत्वाकर्षण बल से अपनी ओर खींच लेता है।

ब्लैक होल क्या है?

यह एक खगोलीय वस्तु है, जिसका गुरुत्वाकर्षण बल अत्यधिक शक्तिशाली होता है। यह बल पदार्थ को बहुत ज्यादा सघन कर देता है। इस कारण इसके छोटे से कण का भी द्रव्यमान बहुत ज्यादा होता है। आप इसका अंदाजा इस तरह लगा सकते हैं। भारत की राजधानी दिल्ली की लंबाई वाले कृष्ण विवर का द्रव्यमान हमारे सूरज के द्रव्यमान से 8 गुना अधिक होगा।

इतने शक्तिशाली गुरुत्व बल के कारण कोई भी वस्तु इससे बच नहीं सकती। ब्लैक होल की सतह को उसकी घटना क्षितिज (Event Horizon) कहते हैं। घटना क्षितिज एक ऐसी सीमा होती है, जिसके पार होने वाली किसी भी घटना का ब्रह्मांड पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

हमारे सौरमंडल में सबसे तेज वेग प्रकाश का है। प्रकाश से तेज इस ब्रह्मांड में कोई नहीं है, लेकिन कृष्ण विवर प्रकाश को भी अपने अंदर निगल लेता है। प्रकाश का परावर्तन नहीं होने के कारण कोई भी ब्लैक होल को देख नहीं सकता।

लेकिन आज की आधुनिक विज्ञान के द्वारा बनाए गए टेलिस्कोप अपने विशेष उपकरणों की मदद से इसको देख और खोज लेते हैं। लेकिन फिर भी हम इसकी बाहरी सीमा से ही इसका अंदाजा लगा सकते हैं। या इसके आसपास पदार्थों पर पड़ने वाले इसके प्रभाव से हम इसको महसूस कर सकते हैं।

ब्लैक होल का निर्माण कैसे होता है?

सबसे पहले अल्बर्ट आइंस्टीन के द्वारा दिए गए “सामान्य सापेक्षता का सिद्धांत” ने ब्लैक होल की भविष्यवाणी की थी। इस सिद्धांत के अनुसार जब एक तारे की मौत होती है। तो वह अपने पीछे एक छोटी और घनी कोर को पीछे छोड़ देता है।

तारे के मरने के बाद अगर इस कोर का भार सूर्य से तीन गुना होगा तो उसका गुरुत्वाकर्षण बल अत्यधिक शक्तिशाली होगा। आइंस्टीन द्वारा दी गई समीकरणों ने दिखाया कि गुरुत्व बल अन्य बलों के साथ अभिभूत होकर एक ब्लैक होल का निर्माण करता है।

इसे हम कुछ इस तरह समझ सकते हैं। जब बहुत बड़े तारे अपने जीवन के आखिरी चरण में होते हैं। तो वो जिस हाइड्रोजन को हीलियम में बदल रहे होते हैं, वो लगभग समाप्त हो जाती है। इसलिए यह विशालकाय तारे अपनी ऊर्जा को बनाए रखने के लिए हीलियम को जलाना शुरू कर देता है।

जिससे धीरे-धीरे तारे के बाहर की परतें अंदर की तरफ ढहने लगती है। जब यह परतें ढहती है, तो एक शक्तिशाली और उज्जवल विस्फोट होता है। इसी विस्फोट को तारे का सुपरनोवा विस्फोट कहते हैं। यह विस्फोट बहुत भयंकर होता है।

सुपरनोवा विस्फोट के बाद तारे का कुछ हिस्सा बच जाता है। अगर यह बचा हिस्सा द्रव्यमान में छोटा हो तो वो एक न्यूट्रॉन स्टार का रूप ले लेता है। न्यूट्रॉन स्टार का घनत्व बहुत ज्यादा होता है, इसके एक चम्मच पदार्थ का वजन माउंट एवरेस्ट के वजन जितना होगा।

लेकिन अगर विस्फोट के बाद बचे हिस्से का वजन सूरज से तीन गुना अधिक होगा तो उसका शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण बल उस बचे पदार्थ पर हावी हो जाएगा। जिससे वो पदार्थ एक छोटे से बिन्दु में सघन हो जाएगा। भौतिकी के ज्ञात नियम इस तरह के अचंभों को समझने में नाकामयाब है।

फिर किसी अवस्था में आकर यह बिन्दु टूटकर एक ब्लैक होल का निर्माण करता है। वास्तव में हम नहीं जानते कि ऐसा कैसे होता है। तारे के सुपरनोवा विस्फोट के बाद अगर यह बिन्दु अकेला है तो वह ब्लैक होल वहीं स्थापित हो जाएगा। फिर वो किसी अन्य वस्तु को निगलने में असमर्थ हो जाएगा।

लेकिन अगर उस बिन्दु के आसपास गैस और धूल के कण विद्यमान हो तो वह उन्हें अपने अंदर खींच लेगा। फिर यह कण अत्यधिक गर्म होने लगेंगे जिससे तेज प्रकाश की उत्पत्ति होगी। इस तरह से एक ब्लैक होल लगातार विकसित होता रहता है।

ब्लैक होल कितने बड़े और छोटे होते हैं?

ब्लैक होल छोटे और बड़े दोनों आकार के होते हैं। इनमें से छोटे ब्लैक होल तो एक परमाणु के आकार जीतने होते हैं। ऐसे ब्लैक होल बहुत सघन और पतले होते हैं, जिनका द्रव्यमान एक पर्वत से भी ज्यादा होता है। द्रव्यमान का अर्थ किसी वस्तु में पदार्थ की मात्रा होती है।

मध्यम ब्लैक होल को तारकीय (Stellar) ब्लैक होल कहते हैं। इस प्रकार के कृष्ण विवर का द्रव्यमान सूर्य से 20 गुना अधिक होता है। सूर्य का द्रव्यमान 1.989×1030 किलोग्राम है। हमारी आकाशगंगा मिल्की-वे में इस तरह के कई ब्लैक होल हो सकते हैं।

इसके अलावा सबसे बड़े और विशालकाय श्याम विवर (ब्लैक होल) को “Supermassive” कहते हैं। इसका भार सूरज के भार से लाखों-करोड़ों गुना अधिक हो सकता है। हाल ही के वर्षों में वैज्ञानिकों ने इस बात का पता लगाया है कि प्रत्येक बड़ी आकाशगंगा के केंद्र में एक Supermassive ब्लैक होल मौजूद है।

हमारी आकाशगंगा के केंद्र में मौजूद ब्लैक होल Sagittarius A है। इस श्याम विवर का द्रव्यमान सूरज के द्रव्यमान से 40 लाख गुना अधिक है। पृथ्वी से इस विशालकाय दानव की दूरी 25,640 प्रकाश वर्ष दूर है। इस तरह हम इस दानव से अभी सुरक्षित हैं।

ब्लैक होल का इतिहास क्या है?

कृष्ण विवर का इतिहास 18वीं सदी से शुरू होता है। जब एक प्राकृतिक दार्शनिक जॉन मिशेल ने एक विचार दिया। उनके अनुसार हमारे ब्रह्मांड में एक ऐसी शक्ति है, जो प्रकाश को भी अपने अंदर समाहित कर लेती है। इसके तुरंत बाद ही पियारे साइमन लाप्लास ने भी ऐसी ही अवधारणा प्रस्तुत की।

उन्होने किसी वस्तु से प्रकाश के पलायन वेग की गणना की, इसके लिए उन्होने न्यूटन के गुरुत्व नियमों का उपयोग किया। इस खोज ने ब्रह्मांड में सघन तारों के होने की प्रबल संभावना उत्पन्न कर दी, इन तारों से प्रकाश का निकालना नामुमकिन था। मिशेल ने इन्हें “Dark Stars” का नाम दिया।

परंतु 1801 में एक ऐसी खोज हुई जिसने “Dark Stars” का विचार गलत साबित कर दिया। इस खोज में यह पता लगाया गया कि प्रकाश एक तरंग के रूप में बहता है। इसलिए गुरुत्वाकर्षण बल प्रकाश पर कैसे प्रभाव डालेगा? लेकिन इसके 115 वर्ष बाद एक महान वैज्ञानिक ने इसका समाधान निकाला।

साल 1915 में अल्बर्ट आइंस्टीन ने “सामान्य सापेक्षता का सिद्धान्त” दिया। इसके एक वर्ष बाद Karl Schwarzschild ने भी इसमें योगदान दिया। कार्ल ने किसी पिंड की एक ऐसी परिधि की खोज की, जिसको प्रकाश पार नहीं कर सकता था। पिंड की इस परिधि की त्रिज्या को “Schwarzschild Radius” कहा गया।

इसके बाद वर्ष 1930 में भारतीय भौतिक विज्ञानी “सुब्रह्मण्यम स्वामी” ने दिखाया कि एक पर्याप्त द्रव्यमान दिए जाने पर एक तारे के इलेक्ट्रॉन और प्रोटोन, न्यूट्रॉन में बदल जाते हैं। फिर “Robert Oppenheimer” ने पाया कि एक शक्तिशाली गुरुत्व बल किसी भी बड़े पिंड को एक छोटे से बिन्दु में बदल सकता है।

धीरे-धीरे यह लोगों के समझ में आने लगी कि यह कोई मिथ्या नहीं है। यह सच में हमारे ब्रह्मांड में मौजूद है। साल 1967 में भौतिक विज्ञानी “जॉन व्हीलर” ने सबसे पहले “ब्लैक होल” शब्द का उपयोग किया, इसके बाद से ही यह शब्द अस्तित्व में आया।

1974 में सदी के महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग ने एक प्रसिद्ध खोज कि, जिसके अनुसार ब्लैक हॉल विकिरण (Radiation) उत्सर्जित करते हैं। हॉकिंग ने महसूस किया कि जब एक कण और उसका विरोधी कण, ब्लैक होल की घटना क्षितिज पर होते हैं। तो वे कुछ अजीब सा व्यवहार करते हैं।

क्योंकि या तो यह कण एक-दूसरे को नष्ट कर देंगे, या इनमें से एक कण ब्लैक होल में गिर जाएगा और दूसरा बाहर की तरफ निकल जाएगा। अगर दोनों कण नष्ट होते हैं तो वे अपनी ऊर्जा ब्रह्मांड में छोड़ देंगे। परंतु अगर एक कण अंदर निगल जाता है तो वह ब्लैक होल को धीरे-धीरे खत्म कर देगा।

लेकिन इसमें एक दूविधा थी, इसके अनुसार अंदर गिरने वाले उस कण का वास्तव में होता क्या है? क्वांटम भौतिकी के नियमों के अनुसार किसी कण भी कण को नष्ट नहीं किया जा सकता। इसके बाद 2004 में हॉकिंग नें माना कि वो गलत थे।

इस तरह से इस बात का पता लगाना थोड़ा मुश्किल है कि असल में ब्लैक होल के अंदर क्या होता है? ऐसी कौनसी वास्तविक शक्ति है जो रास्ते में आने वाली प्रत्येक वस्तु को अपने अंदर निगल लेता है?

ब्लैक होल की संरचना कैसी होती है?

ब्लैक होल अलग-अलग आकार के होते हैं। लेकिन फिर भी इनकी संरचना समान होती है। कृष्ण विवर का पूरा द्रव्यमान एक असीम छोटे और घने बिंदु में केंद्रित होता है, जिसे “Singularity” कहते हैं। कृष्ण विवर का यह बिंदु घटना क्षितिज (Event Horizon) से घिरा रहता है।

इसके अलावा एक घूमता हुआ ब्लैक होल “एर्गोस्फीयर” से घिरा रहता है। यह वह क्षेत्र होता है जिसमें ब्लैक होल अंतरिक्ष को अपनी ओर खींचता है। “एर्गोस्फीयर” घटना क्षितिज के बाद शुरू होता है।

घटना क्षितिज और Singularity के बीच की लंबाई को “Schwarzschild Radius” कहते हैं। यानी Schwarzschild Radius वह लंबाई है, जिसके क्षेत्र में प्रकाश भी आ जाए तो वह निकल नहीं पाता है। यह त्रिज्या ब्लैक होल के द्रव्यमान पर निर्भर करती है।

इसी त्रिज्या का क्षेत्र ही ब्लैक होल को काला बनाती है। जो कुछ भी ब्लैक होल में प्रवेश करता है, उसका द्रव्यमान बढ़ जाता है। जिससे घटना क्षितिज बड़ी होती जाती है। क्योंकि द्रव्यमान बढ़ने पर Schwarzschild Radius का मान भी बढ़ेगा।

Structure of Black Hole

यहाँ G= गुरुत्व नियतांक, M= वस्तु का द्रव्यमान, c= प्रकाश की गति

वैज्ञानिक ब्लैक होल का कैसे पता लगाते हैं?

वैज्ञानिक सीधे तौर पर टेलिस्कोप से कृष्ण विवर का पता नहीं लगा सकते हैं। हालांकि हमारे पास एक्स-किरणों, प्रकाश और अन्य चुंबकीय विकिरणों का पता लगाने वाली शक्तिशाली टेलिस्कोप है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि श्याम विवर प्रकाश का परावर्तन नहीं करता है।

परंतु वैज्ञानिक इसके आसपास के पदार्थों पर पड़ने वाले इसके प्रभाव से इसकी उपस्थिती का पता लगा सकते हैं। जैसे कोई कृष्ण विवर किसी अंतरतारकिय पदार्थ (Interstellar Matter) के बादल के नजदीक से गुजरता है तो यह उस पदार्थ को अपनी ओर खींचेगा।

इसी तरह जब कोई तारा श्याम विवर के नजदीक आएगा तो वो तारे को अपनी ओर तेजी से खींचेगा। जैसे ही तारे का पदार्थ गति करता है, वो गर्म होने लगता है। इस स्थिति में तारा एक्स-रे विकिरणों का उत्सर्जन करेगा। जिसका वैज्ञानिक आसानी से पता लगा लेते हैं।

हाल ही में हुई कुछ खोजों से पता चलता है कि ब्लैक होल अपने आसपास के इलाकों पर शक्तिशाली प्रभाव छोड़ता है। जैसे गामा किरणों का विस्फोट, तारों का भस्म या फटना आदि। इस तरह की शक्तिशाली गतिविधियाँ कृष्ण विवर के होने का सबूत देती है।

तो दोस्तों यह था ब्लैक होल, जिसे हमने इस आर्टिकल में अच्छे से समझाने का प्रयास किया है। लेकिन अगर फिर भी आपके मन में कोई सवाल है तो आप हमें Comment कर के बता सकते हैं। हम आपके सवालों का इंतज़ार कर रहे हैं।

ब्लैक होल कितना शक्तिशाली होता है?

ब्लैक होल बहुत शक्तिशाली होता है। यह अपने रास्ते में आने वाली प्रत्येक वस्तु को निगल लेता है। यहाँ तक कि प्रकाश को। इसे आप अन्तरिक्ष में घूमता विशालकाय दानव कह सकते हैं।

ब्लैक होल का आकार कितना होता है?

ब्लैक होल एक छोटे से परमाणु से लेकर सूरज से करोड़ों गुणा तक बड़े हो सकते हैं। अधिक जानकारी के लिए आप हमारे आर्टिकल को पढ़ सकते हैं।

ब्लैक होल दिखाई कैसे देते हैं?

असल में ब्लैक होल कभी दिखाई नहीं देते हैं। क्योंकि यह प्रकाश के कणों को अपने अंदर निगल लेते है। हम उनका पता उनका पता तभी लगा सकते हैं, जब वो अपने आसपास की वस्तुओं पर अपना प्रभाव छोड़ते हैं।


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