जानिए अंतरिक्ष के बारे में जानकारी वो भी पूरे विस्तार से

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अंतरिक्ष के बारे में जानकारी

अंतरिक्ष एक ऐसा नाम है जिसे सुनते ही हमारा ध्यान आसमान की तरफ जाता है। अंतरिक्ष में बहुत से रहस्य छुपे हुए है। जिनका जवाब आज की आधुनिक विज्ञान के पास नहीं है। अंतरिक्ष के बारे में जानकारी के लिए आप हमारे इस आर्टिकल को अंत तक जरूर पढ़ें।

अंतरिक्ष चार आयामों से मिलकर बना है, जिसमें तीन दिशाएँ और चौथा समय है। आधुनिक वैज्ञानिक इसे “Spacetime” कहती है। हमारे ब्रह्मांड को समझने के लिए हमें अंतरिक्ष के ज्ञान का होना बहुत जरूरी है। अब बात आती है कि ब्रह्मांड और अंतरिक्ष में क्या फर्क है? तो सबसे पहले हम जानते हैं कि अंतरिक्ष क्या है?

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ब्लैक होल एक विशालकाय दानव

अंतरिक्ष क्या है? (अंतरिक्ष के बारे में)

एक पृथ्वीवासी के लिए पृथ्वी से 100 किलोमीटर की ऊंचाई और किसी खगोलीय वस्तु के बीच के क्षेत्र को अंतरिक्ष कहते हैं। यह एक ऐसी जगह होती हैं, जहां सांस लेने के लिए ऑक्सिजन नहीं होती। यहाँ से आकाश काला दिखाई देता है, क्योंकि प्रकाश को नीला रंग देने वाली ऑक्सिजन के अणु पर्याप्त मात्रा में नहीं होते।

सामान्य भाषा में समझे तो दो खगोलीय वस्तुओं के बीच के क्षेत्र को अंतरिक्ष कहते हैं। इसके अलावा अंतरिक्ष एक निर्वात है, जिसका अर्थ है कि ध्वनि के लिए यहाँ कोई माध्यम नहीं है। हम अंतरिक्ष में कुछ भी सुन नहीं सकते।

परंतु हम ऐसा नहीं कह सकते कि अंतरिक्ष पूरी तरह से खाली है। इसमें धूल के कण, गैस, हाइड्रोजन और हीलियम के प्लाज्मा, विद्युत चुंबकीय विकिरण, चुंबकीय क्षेत्र, न्यूट्रीनो और ब्रह्मांडीय किरणें आदि मौजूद है। अंतरिक्ष का आधारभूत तापमान -270.450 सेंटीग्रेड है।

आकाशगंगाओं के बीच का प्लाज्मा ब्रह्मांड में लगभग आधे बेरियोनिक पदार्थ (एक परमाणु से भी छोटा कण) के लिए जिम्मेदार है, इसका संख्या घनत्व एक हाइड्रोजन परमाणु प्रति घन मीटर से भी कम है और तापमान लाखों केल्विन में हैं।

हाल ही में हुए अध्ययनों से पता चलता है कि ब्रह्मांड की अधिकांश आकाशगंगाओं का 90% द्रव्यमान एक अज्ञात रूप में है, जिसे “डार्क मैटर” कहते हैं। इसके साथ ही इस ब्रह्मांड में अधिकांश द्रव्यमान ऊर्जा “डार्क एनर्जि” के रूप में विद्यमान है। इस ऊर्जा को एक प्रकार की निर्वात ऊर्जा भी कहा जाता है।

ब्रह्मांड और अंतरिक्ष में क्या फर्क है?

कुछ लोग यह समझते हैं कि अंतरिक्ष, ब्रह्मांड का ही दूसरा नाम है, दोनों एक ही है। इसके अलावा कुछ लोग इन दोनों को लेकर दुविधा में रहते हैं। वो यह नहीं समझ पाते हैं कि अंतरिक्ष किसे कहे और ब्रह्मांड किसे? लेकिन हम आपकी यह दुविधा आज पूरी करने वाले हैं।

जैसा की ऊपर बताया गया है, दो खगोलीय पिंडों के बीच के क्षेत्र को अंतरिक्ष कहते हैं। इन खगोलीय पिंडों में क्षुद्रग्रह, धूमकेतु, उपग्रह, बौने ग्रह, ग्रह, तारे आदि सभी आते हैं। जिनका एक आकार, द्रव्यमान और गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र है। अंतरिक्ष के बारे में जानकारी में यह एक महत्वपूर्ण पहलू है।

लेकिन ब्रह्मांड उस पूरे क्षेत्र को कहते हैं, जो बिंग-बैंग के बाद बना था। इसमें हर वो एक वस्तु आती है, जो इस संसार में विद्यमान है। यानी अंतरिक्ष ब्रह्मांड का ही एक हिस्सा है। इसलिए ब्रह्मांड को समझने के लिए हमें सबसे पहले अंतरिक्ष को समझना होगा।

अंतरिक्ष का निर्माण कैसे हुआ?

(अंतरिक्ष के बारे में जानकारी)– पूरे ब्रह्मांड का आकार ज्ञात करना अभी मनुष्य के लिए संभव नहीं है। बिग-बैंग सिद्धांत के अनुसार लगभग 13.8 अरब साल पहले ब्रह्मांड का निर्माण हुआ। इसके पहले ब्रह्मांड का पूरा पदार्थ एक बिन्दु में समाहित था, जिसमें 13.8 अरब वर्ष पहले विस्फोट हुआ।

इस विस्फोट के बाद पूरा पदार्थ तेजी से फैलने लगा। विस्फोट के समय प्रारंभिक ब्रह्मांड बहुत गर्म था, लेकिन इसके 3,80,000 वर्ष बाद यह ठंडा होने लगा।

जिससे प्रोटोन और इलेक्ट्रॉन आपस में संयोजित होने लगे, और इस संयोजन ने हाइड्रोजन का निर्माण किया। जब ऐसा हुआ तो पदार्थ और ऊर्जा आपस में द्वियुग्मित हो गए। इस कारण फोटोन के कणों को तेजी से गति करने की ऊर्जा मिली। फोटोनों की इसी गति के कारण अंतरिक्ष तेजी से फैलने लगा।

विस्फोट के बाद ढेर सारा पदार्थ ब्रह्मांड में बिखरने लगा। इस बिखरते हुए पदार्थ ने गुरुत्वाकर्षण बल की मदद से तारों, ग्रहों, आकाशगंगाओं और अन्य खगोलीय पिंडों का निर्माण किया। इन पिंडों के निर्माण के बाद इनके मध्य में एक गहरा निर्वात क्षेत्र बनने लगा। इसी गहरे निर्वात क्षेत्र से अंतरिक्ष का निर्माण हुआ, या यूं कहें यही निर्वात क्षेत्र अंतरिक्ष है।

अंतरिक्ष का वातावरण कैसा है?

अंतरिक्ष पूरी तरह से निर्वात क्षेत्र है, यहाँ हवा का कोई वजूद नहीं है। हालांकि अंतरिक्ष पूरी तरह से खाली नहीं है, इसमें प्रति घन मीटर कुछ न कुछ हाइड्रोजन परमाणु होते हैं। जैसे हम जिस हवा में सांस लेते हैं उसमें प्रति घन मीटर 1025 अणु होते है।

अंतरिक्ष में पदार्थ का घनत्व बहुत कम होने का अर्थ है कि विद्युत चुंबकीय तरंगे बिना किसी रुकावट के आसानी से बड़ी दूरी तय कर सकती हैं। अंतरिक्ष में एक फोटोन का औसत मार्ग 1023 किमी से लेकर 10 अरब प्रकाश वर्ष तक है।

तारे, ग्रह और उपग्रह अपना वायुमंडल गुरुत्वाकर्षण बल के कारण बनाए रखते हैं। वायुमंडल की कोई निश्चित सीमा नहीं होती है, यह वस्तु से ऊंचाई पर इसका प्रभाव कम होता जाता है। क्योंकि वायुमंडलीय गैस का घनत्व धीरे-धीरे वस्तु से दूरी के साथ घटता जाता है।

पृथ्वी से 100 किलोमीटर ऊंचाई पर वायुमंडलीय दबाव 0.032 पास्कल रह जाता है, जो सामान्य वायुमंडलीय दबाव (100,000 पास्कल) से बहुत कम है। इस ऊंचाई के बाद सौर हवाओं और सूर्य से निकलने वाली विकिरणों का दबाव शुरू हो जाता है। इसलिए धरती से 100 किलोमीटर ऊंचाई पर अंतरिक्ष की शुरुआत मानी जाती है।

अंतरिक्ष का तापमान गैस पर पड़ने वाले गतिज गतिविधि के आधार पर नापा जाता है। पूरा अंतरिक्ष फोटोनों से भरा पड़ा है, जिसे कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड रेडिएशन (सीएमबी) के रूप में जाना जाता है। इसी बैकग्राउंड रेडिएशन का तापमान लगभग 3 K (−270 °C; −454 °F) है।

इसके अलावा प्रत्येक खगोलीय पिंड के आसपास एक चुंबकीय क्षेत्र है। जो इस खाली क्षेत्र यानी की अंतरिक्ष में मौजूद है। आकाशगंगाओं में तारे का निर्माण छोटे पैमाने पर डायनेमो उत्पन्न कर सकता है, जिससे लगभग 5-10 μG की अशांत चुंबकीय क्षेत्र की ताकत पैदा हो सकती है।

अंतरिक्ष के कितने भाग है?

अंतरिक्ष को मुख्यतः 4 भागों में बांटा गया है। जो इस प्रकार है- जियोस्पेस, इंटरप्लेनेटरी स्पेस, इंटरस्टेलर स्पेस और इंटरगैलेक्टिक स्पेस। इन चारों में सबसे छोटा जियोस्पेस और सबसे बड़ा इंटरगैलेक्टिक स्पेस है। (अंतरिक्ष के बारे में जानकारी)

जियोस्पेस

जियोस्पेस पृथ्वी के निकट बाह्य अंतरिक्ष का वह क्षेत्र है, जिसमें ऊपरी वायुमंडल और चुंबकमंडल शामिल हैं। इसकी सबसे बाह्य सीमा मैग्नेटोपॉज़ (पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र और सौलर हवाओं के बीच की सीमा) है। व इसकी आंतरिक सीमा आयनमंडल (समुद्र सतह से 100 किलोमीटर की ऊंचाई) है।

जियोस्पेस के वातावरण पर सबसे ज्यादा प्रभाव सूर्य और सौलर हवाओं का रहता है। जियोस्पेस का अध्ययन हेलियोफिजिक्स के अंतर्गत आता है। हेलियोफिजिक्स वह विषय है जिसमें सूर्य और सोलर हवाओं का ग्रहों पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया जाता है।

पृथ्वी के दिन वाले हिस्से में मैग्नेटोपॉज़ सोलर हवाओं के कारण संकुचित हो जाता है। उस समय इसकी धरती के केंद्र से दूरी धरती की 10 गुणा त्रिज्या के बराबर रह जाती है। लेकिन रात वाले हिस्से में यह 100-200 गुणा तक हो जाती है। (धरती की त्रिज्या- 6378.1 किलोमीटर है)।

जियोस्पेस बहुत कम घनत्व पर विद्युत आवेशित कणों से बना एक क्षेत्र है। इन कणों की गति पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र द्वारा नियंत्रित होती है। यह कण आपस में मिलकर एक प्लाज्मा बनाते है, जिनमें लगातार विद्युत धाराएँ बहती रहती है।

वह क्षेत्र जहां पृथ्वी और सूर्य का गुरुत्वाकर्षण बल पूरी तरह संतुलित रहता है, इस क्षेत्र को Hill Sphere कहते हैं। यहाँ पर पृथ्वी और सूर्य का गुरुत्वाकर्षण बल एक दूसरे पर कोई प्रभाव नहीं डालता है। यह क्षेत्र पृथ्वी से 15 लाख किलोमीटर की दूरी पर मौजूद है।

इंटरप्लेनेटरी स्पेस

इंटरप्लेनेटरी स्पेस को सौर हवा द्वारा परिभाषित किया जाता है। जो सूर्य से निकलने वाले आवेशित कणों की एक सतत धारा है। यह अंतरिक्ष में अरबों किलोमीटर तक फैली हुई है। सौर हवाएँ अंतरिक्ष में एक कमजोर वातावरण का निर्माण करती है, जिसे हेलिओस्फीयर कहते हैं।

इस सौर हवा के कण का घनत्व 5-10 प्रोटोन/सेमी3 है, जो लगभग 350-400 किमी/घंटा की रफ्तार से गति करती है। इंटरप्लेनेटरी स्पेस हेलिओपॉज़ तक फैला हुआ है, जहां पर गैलेक्टिक वातावरण चुंबकीय क्षेत्र और सूर्य से निकलने वाले कणों पर हावी होने लगता हैं। हेलिओपॉज़ की दूरी और ताकत सोलर हवाओं पर निर्भर करती है।

इंटरप्लेनेटरी स्पेस पूरी तरह से खाली क्षेत्र नहीं है, इसमें अव्यवस्थित ब्रह्मांडीय किरण बहुत कम मात्रा में मौजूद है। इसके अलावा इसमें आयनित परमाणु नाभिक (Ionized Atomic Nuclei), उपपरमाण्विक कण, गैस, प्लाज्मा, धूल, छोटे उल्का और कई प्रकार के कार्बनिक अणु भी शामिल हैं।

इंटरप्लेनेटरी स्पेस में सूर्य द्वारा उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र होता है। इसके अलावा बृहस्पति, शनि, बुध और पृथ्वी जैसे ग्रहों का भी अपना एक चुंबकीय क्षेत्र हैं। ये चुंबकीय क्षेत्र सौर हवाओं से निकलने वाले कणों का एक जाल बनाती है, जिससे आवेशित कणों की एक बेल्ट बन जाती है। जो इनके वायुमंडल को सुरक्षित रखती है। जबकि बिना चुंबकीय क्षेत्र वाले ग्रहों का वायुमंडल धीरे-धीरे सौर हवाओं के कारण नष्ट हो जाता है।

इंटरस्टेलर स्पेस

(अंतरिक्ष के बारे में जानकारी)- जैसा की नाम से ही स्पष्ट है। यह तारों के बीच का क्षेत्र है, जो खाली नहीं है। इसमें 70% हाइड्रोजन, 28% हीलियम और 2% भारी गैसें व अन्य पदार्थ शामिल है। इंटरस्टेलर स्पेस के अध्ययन को इंटरस्टेलर माध्यम कहा जाता है।

अंतरतारकीय माध्यम में पदार्थ का घनत्व काफी भिन्न होती है। इसका औसत घनत्व लगभग 106 कण प्रति m3 है। लेकिन ठंडे आणविक बादल में यह 108-1012 प्रति m3 तक हो जाता है। उच्च घनत्व वाले पदार्थ के बड़े क्षेत्रों को आणविक बादल के रूप में जाना जाता है।

यहाँ एक आयनित हीलियम परमाणु अपेक्षाकृत प्रचुर मात्रा में मौजूद कार्बन मोनोऑक्साइड को तौड़कर आयनित कार्बन का निर्माण करती है। जिसके परिणामस्वरूप कार्बनिक रासायनिक प्रतिक्रियाएं होती हैं।

हमारे सूर्य का इंटरस्टेलर माध्यम सूर्य से 100 Parsecs (1 Parsecs- 2,06,000 AU) की दूरी तक फैला हुआ है। विज्ञान की भाषा में इस क्षेत्र को Local Bubble कहा जाता है। लोकल बबल में दर्जनों गर्म अंतरतारकीय बादल होते हैं। जिनका तापमान 7,000 K तक और त्रिज्या 0.5-5 पीसी होती है।

इंटरगैलेक्टिक स्पेस

इंटरगैलेक्टिक स्पेस आकाशगंगाओं के बीच का भौतिक स्थान है। आकाशगंगाओं के बड़े पैमाने पर वितरण के अध्ययन से पता चलता है कि ब्रह्मांड की फोम जैसी संरचना है। यह आकाशगंगाओं के बीच का विशाल रिक्त स्थान है।

उदाहरण के लिए अगर आप मिल्की-वे से एंड्रोमेडा आकाशगंगा तक सफर करना चाहते है, तो आपको 25 लाख प्रकाश वर्ष की दूरी तय करनी होगी। वो भी घनघोर अंधकार में, क्योंकि यहाँ पर आपको प्रकाश का एक कण भी नहीं मिलेगा।

इंटरगैलेक्टिक स्पेस को आप एक पूर्ण निर्वात क्षेत्र मान सकते हैं। क्योंकि इसमें बहुत कम धूल और मलबा है। वैज्ञानिकों ने गणना करने पर पता लगाया कि इस बीहड़ में प्रति घन मीटर केवल एक हाइड्रोजन परमाणु है। पदार्थों का घनत्व आकाशगंगाओं के पास अधिक होता है। परंतु आकाशगंगाओं के मध्य बिंदु में यह घनत्व लगभग शून्य होता है।

आकाशगंगाएं एक दुर्लभ प्लाज्मा से जुड़ी होती हैं। जिसके बारे में माना जाता है कि इसमें एक ब्रह्मांडीय फिलामेंटरी संरचना होती है। जो ब्रह्मांड के औसत घनत्व से थोड़ी घनी होती है। इस पदार्थ को इंटरगैलेक्टिक माध्यम के रूप में जाना जाता है और यह ज्यादातर आयनित हाइड्रोजन से बना होता है। खगोलविदों का मानना ​​है कि इंटरगैलेक्टिक माध्यम का घनत्व ब्रह्मांड के औसत घनत्व से लगभग 10 से 100 गुना अधिक है।

इस इंटरगैलेक्टिक माध्यम को दूरबीनों द्वारा पृथ्वी से देखा जा सकता है, क्योंकि यह बहुत गर्म होता है। यहाँ तक कि इसका तापमान लाखों डिग्री में होता है। यह इतना गर्म होता है कि हाइड्रोजन के नाभिक से इलेक्ट्रॉन को अलग कर देता है। हम एक्स-रे स्पेक्ट्रम में इन टकरावों से निकलने वाली ऊर्जा का पता लगा सकते हैं।

तो दोस्तों अंतरिक्ष के बारे में जानकारी आपको कैसी लगी। अंतरिक्ष के बारे में जानकारी के लिए अगर आपके मन में कोई सुझाव है तो वो आप हमारे साथ साझा कर सकते हैं। हम आपके सुझावों की इज्जत करते हैं। अगर अंतरिक्ष के बारे में जानकारी से संबधित आपके मन में कोई सवाल है तो आप हमें Comment में बता सकते हैं।

अंतरिक्ष के बारे में सबसे खास पहलू क्या है?

अंतरिक्ष के बारे में सबसे खास पहलू यह है कि यह पूरी तरह खाली न होकर किसी न किसी पदार्थ से भरा है। हालांकि इसका घनत्व बहुत कम है।

इंटरगैलेक्टिक अंतरिक्ष के बारे जानकारी क्या है?

यह आकाशगंगाओं के बीच का विशाल रिक्त स्थान है। उदाहरण के लिए अगर आप मिल्की-वे से एंड्रोमेडा आकाशगंगा तक सफर करना चाहते है, तो आपको 25 लाख प्रकाश वर्ष की दूरी तय करनी होगी। वो भी घनघोर अंधकार में, क्योंकि यहाँ पर आपको प्रकाश का एक कण भी नहीं मिलेगा।

अंतरिक्ष के बारे में जानकारी के लिए हमें क्या करना चाहिए?

अंतरिक्ष के बारे में जानकारी के लिए आपको लगातार हमसे जुड़ा रहना होगा। क्योंकि हम आपके लिए रोजाना कुछ न कुछ नया लेकर आते हैं। जो आपके ज्ञान को काफी बेहतर बनाएगा।


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