इस तरीके से करें हल्दी की खेती और पाएँ अच्छा मुनाफा

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हल्दी की खेती

हल्दी की खेती- हल्दी एक भारतीय मसाला है, जो खाने को स्वादिष्ट और लजीज बनाता है। अकेले चखने पर इसका स्वाद कुछ खास नहीं है, लेकिन यह अन्य मसालों के साथ मिलकर पकवान का जायका बदलती है। वैसे मसाले के साथ-साथ यह एक गुणकारी और चमत्कारी औषधि भी है। आयुर्वेद में इसे ‘हरिद्रा’ भी कहा जाता है।

हल्दी का वैज्ञानिक नाम Curcuma Longa है, यह अदरक की प्रजाति का एक पौधा है। इसकी प्रजाति का नाम C. longa और यह Curcuma वंश का पौधा है। हल्दी Zingiberaceae परिवार का सदस्य है, इसे अंग्रेजी में Turmeric कहते हैं।

भारत के साथ-साथ यह चीन और दक्षिणी एशिया में भारी मात्रा में उगाई जाती है। भारत में इसकी खेती लगभग 1.70 लाख हेक्टेयर पर की जाती है, जिससे 7 लाख टन हल्दी का उत्पादन होता है। इसमें से कुल उत्पादन का लगभग 35,000 टन विदेशों में निर्यात किया जाता है।

हल्दी में 5.4% जादुई उड़नशील तेल, 6.5% प्रोटीन, 68.6% कार्बोहाइड्रेट, 3.5% खनिज, विटामिन A और कुर्कुमिन नामक द्रव्य आदि पाए जाते हैं। हल्दी के फाइटोकेमिकल घटकों में डायरिलहेप्टानोइड्स प्रमुख है, जो इसे अधिक गुणकारी बनाता है।

हल्दी का हिन्दू धर्म में एक खास महत्व है, शादी-समारोहों में इसका उपयोग एक मांगलिक वस्तु के रूप में किया जाता है। हिन्दू परंपराओं में शादी से ठीक पहले दूल्हे और दुल्हन को हल्दी और तेल के मिश्रण का लेप लगाया जाता है। इसे हल्दी की रस्म भी कहा जाता है।

हल्दी के फायदे

हल्दी एक आयुर्वेदिक वस्तु है, क्योंकि इसमें ढ़ेर सारे औषधीय गुण पाए जाते हैं। हल्दी के यह गुण कई बीमारियों और रोगों का इलाज करने में सक्षम है। यह शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में भी सहायक है। रिसर्च से पता चलता है, कि हल्दी में एंटीसेप्टिक, एंटीओक्सीडेंट, हेप्टोप्रोटेक्टिव, कार्डियोप्रोटेक्टिव आदि अनेक गुण होते हैं।

हल्दी के निम्न फायदे होते है-

  • चोट लगने पर दूध में हल्दी मिलाकर पीने से घाव जल्दी भरते है।
  • एक चम्मच हल्दी और एक चम्मच शहद का मिश्रण मधुमेह से बचाता है।
  • हल्दी, मुल्तानी मिट्टी और गुलाबजल के मिश्रण का लेप चेहरे पर लगाने से चेहरा निखरता है।
  • हल्दी खाने से खून साफ होता है।
  • हल्दी हमारे हृदय को सुरक्षित रखती है।
  • इसका सेवन शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है।
  • इसके अलावा गठिया में इसका उपयोग काफी हद तक लाभदायक है।

खेती कैसे करें?

हल्दी की खेती करना मुश्किल और आसान दोनों ही है। अगर आपके आसपास का वातावरण हल्दी की खेती के अनुरूप है, तो यह खेती आसान हो जाती है। हल्दी की खेती आदर्ता वाले क्षेत्रों में की जाती है, यह 6-7 महीने की खेती होती है। आइए हम इसके बारे में विस्तार से समझते हैं।

लागत और मुनाफा कितना है?

हल्दी की खेती कम लागत में ज्यादा मुनाफा देने वाली खेती है। इसके लिए आपको एक बीघा में 2 क्विंटल बीज का प्रयोग करना होता है। इसका बीज आपको बाज़ार में आसानी से मिल जाता है। बशर्ते आपका क्षेत्र हल्दी की खेती के लिए उपयुक्त स्थान हो।

इसके अलावा इसमें उर्वरक खादों का भी उपयोग किया जाता है। इन खादों में कैल्सियम अमोनियम नाइट्रेट, सुपर फॉस्फेट और म्यूरेट ऑफ पोटाश का उपयोग किया जाता है। जिनकी प्रति बीघा अलग-अलग मात्रा होती है। पूरी फसल में चार-पाँच पानी लगाने पड़ते है।

कुल मिलकर अंत तक देखें तो इसमें प्रति बीघा 6 हजार से 7 हजार की लागत आती है। फसल पककर तैयार होने के बाद आपको 25 क्विंटल प्रति बीघा तक कच्चा माल प्राप्त कर लेते हैं। इस कच्चे माल की बाज़ार में 2000 रुपए तक कीमत होती है। यानी आप प्रति बीघा 20,000 का मुनाफा इस फसल से कमा सकते हैं।

जलवायु

हल्दी की खेती के लिए गर्म और नम जलवायु उपयुक्त मानी जाती है। समुद्र तल से 1500 मीटर की ऊंचाई तक आप इस फसल का उत्पादन कर सकते हैं। वैसे 600-1000 मीटर की ऊँचाई इसके लिए सबसे अच्छी मानी जाती है।

बीज के अंकुरण के समय तापमान 30-35 डिग्री, शाखा फूटने के समय 25-30 डिग्री, कद बनाते समय 20-25 और पौधे के विकसित होते समय 18-20 डिग्री सेन्टीग्रेड होना चाहिए। इसके साथ वर्षा भी अच्छी मात्रा में होनी चाहिए। 1200-1400 मिमी. बारिश इसके लिए उपयुक्त मानी जाती है।

मिट्टी

यह एक प्रकार की जमीन में विकसित होने वाली फसल है, इसलिए इसे दोमट्ट या हल्की मिट्टी में लगानी चाहिए। ताकि इसका विकास अच्छे से हो सके और इसे जमीन से उखाड़ने में कोई समस्या न हो। इसके अलावा मिट्टी की अच्छी से क्यारियाँ बनाई जा सके।

हल्दी के पौधे को थोड़ी अम्लीयता पसंद है, इस कारण इसकी मिट्टी का पीएच मान 5-7 के बीच होना चाहिए। ज्यादा कीचड़ वाली मिट्टी इसके लिए बिल्कुल अनुपयुक्त है।

हल्दी की अच्छी किस्में

जैसा की हम जानते हैं हम जितनी अच्छी किस्म का चयन करेंगे, हमें उससे उतना ही फायदा होगा। हल्दी की खेती के लिए समय के हिसाब से अलग-अलग किस्में है। जो इस प्रकार से हैं-

कम अवधि की किस्में

यह किस्में 6-7 महीनों में तैयार हो जाती है। इनकी गाँठे दिखने में नाजुक और सुगंधित होती है, जिसमें वाष्पशील तेलों की प्रचुरता पाई जाती है। इसके अंतर्गत कस्तुरी, सुवर्णा, सुरोमा और सुगना आदि किस्में आती है।

मध्यम अवधि की किस्में

इनमें रश्मि, रोमा, केसरी जैसी किस्में आती है। यह किस्में लगभग 7-8 महीनों के मध्य पककर तैयार होती है। उपरोक्त किस्में उपज और गुणवता में अच्छी होती है। कुछ किसान इन्हें केसरी किस्में भी कहते हैं, क्योंकि केसरी इनमें सबसे उत्तम है।

लंबी अवधि की किस्में

इन क़िस्मों में टेंकोरपेट और माईडुकुद प्रमुख है। यह सबसे उत्तम किस्में है, क्योंकि यह सबसे ज्यादा मुनाफा देती है। यह किस्में 8-9 महीनों में तैयार होती है, जो उपज और गुणवता के हिसाब से सर्वोत्तम किस्में हैं।

खाद व उर्वरक

अन्य फसलों की तरह ही गोबर की खाद इस फसल के लिए सबसे अच्छी खाद है। इसके अलावा आपको कैल्सियम अमोनियम नाइट्रेट (कैन), सुपर फॉस्फेट और म्यूरेट ऑफ पोटाश की जरूरत होती है। इनकी अलग-अलग मात्रा रखनी होती है, वरना यह पौधे को खराब कर सकती है।

प्रति बीघा के हिसाब से आपको गोबर की खाद 16 क्विंटल, कैल्सियम अमोनियम नाइट्रेट 10 किलोग्राम, सुपर फॉस्फेट 15 किलोग्राम और म्यूरेट ऑफ पोटाश 8 किलोग्राम की जरूरत पड़ेगी।

गोबर की खाद, सुपर फॉस्फेट और म्यूरेट ऑफ पोटाश को खेत तैयार करते समय डालें। बाकी बची कैन खाद को आप तीन हिस्सों में डाल सकते हैं। एक हिस्सा खेत तैयार करते समय और बाकी दोनों एक-एक महीने के अंतराल पर डाल सकते हैं।

खेत को तैयार करना

इसके बाद हमें खेत को तैयार करना होगा। जिसके लिए हमें खेत की 4-5 बार अच्छे तरीके से जोतना होगा। ताकि जिससे मिट्टी समतल हो जाए और क्यारियाँ अच्छे से बन जाएँ। जोतने के बाद इसमें खाद डाली जाती है, फिर उसे एक बार फिर हल से जोता जाता है। ताकि खाद जमीन में अच्छे से मिल जाएँ।

इसके बाद आपको 30-30 सेमी. की दूरी पर क्यारियाँ बनानी होगी, जो जमीन से 15 सेमी. ऊंची हो। हल्दी का बीज नहीं बोया जाता बल्कि रोपण किया जाता है, जो प्रकंद (अन्तः भूमिक पौधे का तना) के द्वारा होता है।

प्रकंदों की मात्रा एवं लगाने की विधि

एक हेक्टेयर में लगभग 22-26 क्विंटल प्रकंदों की आवश्यकता होती है। प्रकंदों के गुणवता के हिसाब से इनकी मात्रा कम-ज्यादा भी हो सकती है। बीजाई के लिए सबसे पहले तैयार हुए प्रकंदे ही लगाई जाते हैं, हालांकि बड़े प्रकंदों के तन्नों को भी काटकर लगाया जा सकता है।

प्रकंदे शुरुआत में बनाई गई 30-30 सेमी. दूर क्यारियों पर लगाए जाते हैं। जिसमें एक पौधे से दूसरे पौधे की दूरी कम से कम 20 सेमी. होनी चाहिए। ज्यादा नजदीक होने पर पौधे का विकास अच्छे से नहीं हो पाएगा। प्रकंदों को 4-5 सेमी. की गहराई में लगाना चाहिए।

पौधे लगाने के बाद पूरे खेत को हरी पतियों से ढ़क देना चाहिए, ताकि पौधे तेज धूप से बचे रहें। साथ ही इससे जमीन में नमी बनी रहती है। बीजाई के लिए उपयुक्त समय निचले पर्वतीय क्षेत्रों में मई-जून और मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में अप्रैल-मई होता है।

सिंचाई

हल्दी की खेती करने के लिए ज्यादा सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है। आप चार से पाँच सिंचाइयों में भी इसे पकाकर तैयार कर सकते हैं। मानसून आने से पहले सबसे ज्यादा सिंचाई की आवश्यकता होती है। इसके बाद आप पौधों में हल्का-हल्का पानी फेर सकते हैं।

सिंचाई करते समय एक बात का हमेशा ध्यान रखें, कि पानी क्यारियों में ज्यादा एकत्रित न हों। इसके लिए उच्च गुणवता की जल निकासी की व्यवस्था होनी चाहिए। क्योंकि एक जगह एकत्रित हुआ पानी हल्दी को नुकसान पहुंचाता है।

खरपतवार एवं कीट नियंत्रण

धीरे-धीरे पौधों का विकास होता रहेगा। इस समय में आपको सबसे ज्यादा खरपतवार पर ध्यान देना होगा। 15 दिनों के बाद एक बार खरपतवार को जड़ से निकाल देना चाहिए, ताकि यह पौधों को ज्यादा नुकसान न पहुंचा सकें। निराई समय-समय पर करते रहने से पौधों को प्राप्त स्थान और नमी मिलेगी।

लेकिन अगर खरपतवार नियंत्रण से बाहर हो गया तो यह पूरी फसल को नष्ट कर देगा। इसके अलावा हल्दी में समान्यतः शूटबोरर, सॉफ्टराट और लीफ स्पाट नामक कीटनाशक पाए जाते हैं। कीटनाशक दवाओं की मदद से आप इन पर नियंत्रण पा सकते हैं।

खुदाई कैसे करें?

जनवरी महीने के आसपास जब हल्दी के पौधों की पत्तियाँ पीली पड़ने लग जाती है, तो उस समय यह खुदाई के लिए सबसे उत्तम होती है। खुदाई करते समय इस बात का ध्यान रखें की आप अंदर से हल्दी को नुकसान ने पहुंचाए।

वैसे आजकल बाज़ार में आधुनिक मशीनें इस समस्या को दूर करती हैं। हमारी सलाह से आप खुदाई उन मशीनों से ही करें। एक बात का आप विशेष ध्यान रखें, खुदाई करने से पहले आप अस्वस्थ पौधों को अलग कर लें। क्योंकि वो हल्दी के दाम में गिरावट ला सकते हैं।

हल्दी बीज का छंटवारा

इसके बाद आप इनमें से अच्छी गांठों का चयन करें। इन चयनित गांठों को आप एक ठंडे कमरे में 10-12 दिन तक रखें। ज्ञात रहें की आपने हल्दी पर फफूंदनाशी और कीटनाशी दवाइयों का छिड़काव किया हो। इसके लिए आप डायथेन एम 250 ग्राम, बैविस्टीन 100 ग्राम, डरमेट 100 मिली. को 100 लीटर पानी में मिश्रित करें।

इस घोल को सावधानीपूर्वक हल्दी पर छिड़काव करें। इसके तुरंत बाद आपको गांठों को हल्की धूप में सुखाना होगा, ताकि इनके ऊपर की नमी खत्म हो जाये। इसमें से आप स्वस्थ गांठों को हल्दी बीज के लिए चयन कर सकते हैं।

हल्दी बनाने की विधि

हल्दी बनाने के लिए आपको सबसे पहले प्रकंदों को अच्छी तरह से धोना होगा, जिससे उनपर लगी मिट्टी साफ हो जाये। फिर इसे 5 से 7 दिनों के लिए पत्तियों से ढककर रखते हैं। फिर एक ही आकार के प्रकंदें अलग कर लिए जाते हैं। इसके बाद इन प्रकंदों को सोडियम कार्बोनेट या चूने के पानी में उबाला जाता है।

हल्का सा उबलने के बाद प्रकंदों में हल्दी की खुशबू आने लग जाती है। आप अपनी अंगुलियों या किसी वस्तु से हल्दी को चेक कर सकते हैं। अगर हल्दी मुलायम हो जाती है, तो इसे ऊबालना बंद कर देना चाहिए। फिर इन ऊबली हुई गांठों को 10-12 दिनों तक धूप में सूखा देना चाहिए। अब यह हल्दी पीसने के लिए तैयार है।

हल्दी को सुंदर दिखाना

हल्दी को सुंदर दिखाने के लिए इस पर पॉलिश की जाती है। कम मात्रा में हल्दी को फर्श पर रगड़कर साफ किया जाता है, जिससे वो चमकने लग जाती है। लेकिन बड़ी मात्रा में पॉलिश करने के लिए आधुनिक मशीनों का उपयोग किया जाता हैं।

100 ग्राम हल्दी को सुंदर और आकर्षित दिखाने के लिए 0.04 ग्राम फिटकरी, अरंडी का तेल 0.14 मिली., सोडियम बाई सल्फाईड 30 ग्राम और 30 मिली. सांद्र हाईड्रोक्लोरिक अम्ल की आवश्यकता होती है।

इसके अलावा हल्दी को पीला दिखाने के लिए रंग का उपयोग किया जाता है। तो इस प्रकार होती है हल्दी की खेती जिससे आप अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।

सौर्स- भारतीय किसान केंद्र

हल्दी की खेती से मुनाफा कितना होता है?

आप इससे एक फसल में प्रति बीघा 20,000 तक का मुनाफा कमा सकते हैं।

हल्दी की खेती के लिए सबसे उत्तम क्षेत्र कौनसा है?

हल्दी की खेती के लिए पर्वतीय क्षेत्र सबसे उत्तम है।

हल्दी की खेती के लिए कौनसी किस्म अच्छी है?

रश्मि किस्म इसके लिए सबसे अच्छी है?


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