रहस्यमयी मिस्र के पिरामिडों का निर्माण किसने किया था?

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मिस्र के पिरामिडों का निर्माण किसने किया था?

दुनिया के सबसे बड़े आश्चर्यों में से एक मिस्र के पिरामिड बहुत रहस्यमई और अद्भुत है। मिस्र के पिरामिड एक पुरातात्विक चमत्कार हैं, जो रेगिस्तान की रेत में निर्मित ऊँचे-ऊँचे और विशालकाय पिंड है। इनकी विशालता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यह मीलों दूर से दिखाई देते है।

इन पिरामिडों का निर्माण निस्संदेह एक बहुत बड़ा काम था। तो अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि मिस्र के पिरामिडों का निर्माण किसने किया था और वे कौन लोग थे जिन्होंने इसके निर्माण में अपना योगदान दिया था?

मिस्र के पिरामिडों का निर्माण किसने किया? इसके बारे में कई सिद्धांत हैं। जिनमें अटलांटिस के ‘खोए हुए’ शहर के निवासी और एलियंस का सिद्धांत प्रमुख है। आज के कुछ बुद्धिजीव एलियंस को इनका रचयिता मानते हैं। हालाँकि इनमें से किसी भी सिद्धांत को मानने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं हैं। तो आइए हम बताते हैं कि मिस्र के पिरामिडों का निर्माण किसने किया था?

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विश्लेषण

पिरामिडों का निर्माण यहूदी दासों द्वारा नहीं किया जा सकता था, क्योंकि मिस्र के इतिहास में इनका कोई भी पुरातात्विक अवशेष नहीं मिला है। मिस्र में हुई अब तक की खुदाई में 4,500 साल पहले की तारीख तक यहूदियों का कोई अंश नहीं मिला है।

इसके अतिरिक्त इब्रानी बाइबिल में मिस्र में यहूदियों के दास होने के बारे में बताई गई कहानी “रामेसेस” नामक एक शहर को संदर्भित करती है। पाई-रामेसेस नाम के एक शहर की स्थापना मिस्र के 19वें राजवंश (लगभग 1295-1186 ईसा पूर्व) के दौरान हुई थी और इसका नाम रामेसेस-II के नाम पर रखा गया था, जिन्होंने 1279-1213 ईसा पूर्व शासन किया था। मिस्र में पिरामिडों का निर्माण का युग समाप्त होने के बाद इस शहर का निर्माण किया गया था।

पुरातत्वविद इज़राइल फ़िंकेलस्टीन और नील आशेर सिल्बरमैन ने अपनी पुस्तक “The Bible Unearthed: Archaeology’s New Vision of Ancient Israel and the Origin of its Sacred Texts” (The Free Press, 2001) में लिखा है, “मिस्र में शुरुआती इज़राइलियों के बारे में हमारे पास कोई सुराग नहीं है, न ही मंदिरों की दीवारों पर, न ही स्मारक शिलालेखों में, न ही मकबरे के शिलालेखों में और न ही पपीरी में।”

इसके अलावा, अटलांटिस के खोए हुए शहर के लिए किसी भी समय अवधि में कोई पुरातात्विक साक्ष्य नहीं मिला है और कई विद्वानों का मानना ​​है कि यह कहानी काल्पनिक है। इसके अलावा जहां तक ​​एलियंस का सवाल है, तो यह विचार इस दुनिया से बाहर है।

इस प्रकार से वास्तव में यह सभी सबूत बताते हैं कि प्राचीन मिस्रियों ने ही पिरामिडों का निर्माण किया था। लेकिन पिरामिड बनाने वाले कैसे रहते थे, उन्हें कैसे मुआवजा दिया जाता था और उनके साथ कैसा व्यवहार किया जाता था? यह एक रहस्य है, जिस पर शोधकर्ता अभी भी जांच कर रहे है।

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पिरामिड और उनके निर्माता

मिस्र में 100 से अधिक प्राचीन पिरामिड हैं, लेकिन इसका सबसे प्रसिद्ध पिरामिड पहले चरण में बना पिरामिड है। इसे फिरौन (प्राचीन मिस्र के राजाओं की जाति या धर्म या वर्ग संबंधी नाम) जोसर (लगभग 2630-2611 ईसा पूर्व) के शासनकाल के दौरान बनाया गया था। यह पहला वास्तविक पिरामिड है, जिसकी चिकनी भुजाएँ हैं।

फिरौन स्नेफ्रू (लगभग 2575-2551 ईसा पूर्व) के समय में ऐसे ऐतिहासिक स्मारक बनाने के नियम थे। इन सबका विवरण मार्क लेहनेर ने अपनी पुस्तक “द कम्प्लीट पिरामिड्स: सॉल्विंग द एन्सिएंट मिस्ट्रीज” (थेम्स एंड हडसन, 2008) में दिया है।

ग्रेट पिरामिड का निर्माण गीज़ा में फिरौन राजा खुफू (लगभग 2551-2528 ईसा पूर्व) के शासनकाल के दौरान किया गया था और उसके दो उत्तराधिकारी खफरे (लगभग 2520-2494 ईसा पूर्व) और मेनकौर (लगभग 2490-2472 ईसा पूर्व) ने भी गीज़ा में पिरामिड बनाए थे।

लेहनेर ने अपनी पुस्तक में उल्लेख किया है कि फिरौनों ने धीरे-धीरे न्यू किंगडम (1550-1070 ईसा पूर्व) के दौरान पिरामिडों का निर्माण बंद कर दिया था। पिछले कुछ दशकों में पुरातत्वविदों को कुछ नए सबूत मिले हैं जो इस बात का सुराग देते हैं कि पिरामिड बनाने वाले कौन थे और वे कैसे रहते थे?

मिस्र के लाल सागर तट पर वादी अल-जर्फ में 2013 में खोजे गए पपीरी (पुराने समय में उपयोग होने वाला कागज) सहित अन्य लिखित रिकॉर्ड इस बात की ओर संकेत करते हैं कि इन्होंने गीजा में निर्माण सामग्री लाने में मदद की थी। वादी अल-जर्फ में पाया गया पपीरी 200 आदमियों के एक समूह के बारे में बताता है जिसका नेतृत्व मेरर नामक एक निरीक्षक करता है।

श्रमिकों के समूह ने तुरा से ग्रेट पिरामिड तक लगभग 11 मील (18 किलोमीटर) की दूरी पर नील नदी के किनारे नाव से चूना पत्थर पहुँचाया, जहाँ पत्थर का उपयोग स्मारक के बाहरी आवरण के निर्माण के लिए किया गया था।

अतीत में मिस्र के वैज्ञानिकों ने यह सिद्धान्त दिया था, कि पिरामिड बनाने वाले कृषि श्रमिक हुआ करते थे। उनको यह काम तब दिया जाता था, जब कृषि में काम बहुत कम हो जाता था। हालाँकि पुराने अभिलेखों में इसे अभी समझने की ज्यादा जरूरत है।

ऐसा माना जाता है कि पिरामिड बनाने वाले यह श्रमिक पूरे मिस्र की यात्रा करते थे, ताकि वे अपने काम के तरीके का अच्छे से अनुभव कर सके। हालाँकि इस बात से यह स्पष्ट होता है कि वे कृषि श्रमिक की बजाय पेशेवर निर्माणकर्ता थे।

2013 में मिले पपीरी के अनुसार इन श्रमिकों को आहार के रूप में खजूर, सब्जियाँ, मूर्गी और माँस मिलता था। ऐसा पेरिस-सोरबोन विश्वविद्यालय मिस्र के एक प्रोफेसर पियरे टैलेट ने कहा है। जो पपीरी को समझ रहे हैं और उन्हें खोजने वाली टीम के मुखिया हैं।

स्वस्थ आहार के अलावा पपीरी कार्य दल के सदस्यों को नियमित रूप से ऐसे वस्त्र प्राप्त करने का वर्णन करता है जिन्हें “शायद उस समय एक तरह का पैसा माना जाता था।”

इसके अतिरिक्त उच्च पदस्थ पदों पर काम करने वाले अधिकारी जो पिरामिड निर्माण में शामिल थे, उन्हें “भूमि का अनुदान दिया जाता था।” ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि मिस्र के इतिहास में कभी-कभी अधिकारियों को भूमि अनुदान दिया जाता था। हालांकि यह अज्ञात है कि पिरामिड निर्माण से जुड़े अधिकारियों को भूमि अनुदान भी दिया गया था या नहीं।

मार्क लेहनेर (Director of Ancient Egypt Research Associates-AERA) और उनकी टीम गिजा में एक ऐसे शहर की खुदाई कर रहे हैं, जहां मैनकोर के पिरामिड बनाने वाले श्रमिक रहा करते थे। अब तक खुदाई में पुरातत्वविदों को इस बात के प्रमाण मिले हैं कि वहाँ के लोग बड़ी मात्रा में बीयर पीते, माँस खाते और रोटियां बनाते थे।

साइट पर पाए गए जानवरों की हड्डियों के आधार पर और श्रमिकों की पोषण संबंधी जरूरतों को देखते हुए, पुरातत्वविदों का अनुमान है कि लगभग 1800 किलोग्राम माँस की रोजाना खपत होती थी। माँस की आपूर्ति के लिए इन जानवरों का रोजना वध किया जाता था। जिनमें मवेशी, भेड़ और बकरियाँ शामिल हैं।

पिरामिड के पास कब्रों में दफन किए गए श्रमिकों के अवशेषों से पता चलता है कि श्रमिकों की हड्डियाँ अच्छे तरीके से सेट की गई थीं। यह इस बात का सुझाव है कि उस समय उनके पास अच्छी चिकित्सा सुविधा थी। पिरामिड बनाने वालों के समृद्ध आहार, चिकित्सा देखभाल के साक्ष्य और भुगतान के रूप में वस्त्र प्राप्त करने के साथ, मिस्र के वैज्ञानिकों ने आम तौर पर इस बात पर सहमति व्यक्त की है कि श्रमिक गुलाम नहीं थे।

इस तरह से यह स्पष्ट है कि मिस्र के पिरामिडों का निर्माण न तो एलियन्स ने किया है और न ही किसी दिव्य शक्ति ने। इन्हें तो सिर्फ और सिर्फ मिस्र के ही निवासियों ने बनाएँ हैं। हालाँकि पिरामिडों को बनाने वाले श्रमिक अपने उच्च अधिकारियों के इशारों और अपनी सूझ-बूझ से काम करते थे।

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