मशरूम की खेती कैसे होती है (Mushroom Ki Kheti Kaise Hoti Hai)?

मशरूम की खेती कैसे होती है?

Mushroom Ki Kheti Kaise Hoti Hai– मशरूम के बारे में आपने जरूर सुना होगा। एक ऐसी वस्तु जो बारिश के बाद जमीन से निकलती है और कुछ दिनों के बाद पककर खत्म हो जाती है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान मशरूम ने दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाई है।

वर्तमान समय में बढ़ती आबादी और घटती रोग प्रतिरोधक क्षमता ने मनुष्य के लिए बहुत बड़ी समस्या पैदा कर दी है। इंसान अब खुद को स्वस्थ रखने के लिए ऐसी वस्तुओं का सेवन कर रहा है, जो उसे बीमारियों से दूर रखें। मशरूम भी एक ऐसा खाद्य पदार्थ है जो पौष्टिकता से भरा हुआ है।

मशरूम में प्रोटीन, विटामिन एवं खनिज लवण प्रचूर मात्रा में पाए जाते हैं। यह एक ऐसी फसल है जिसके लिए आपको खेत की आवश्यकता नहीं है। आप इसे अपने बगीचे, घर या घर की छत पर भी उगा सकते हैं। लेकिन अगर आप इससे कमाई करना चाहते हैं तो आपको एक खुली जगह का चयन करना होगा।

तो यह है सबसे ज्यादा कमाई वाली फसल?

मनुष्य प्राचीनकाल से मशरूम का सेवन कर रहा है। लेकिन हाल ही के वर्षों में मशरूम का बहुत ही शानदार विकास हुआ है। आजकल किसान मशरूम की खेती कर अच्छा-खासा मुनाफा कमा रहे हैं। बाजार में बढ़ती मांग को देखते हुए मशरूम की खेती करना एक फायदे का सौदा है।

तो आइए आज हम जानते हैं कि मशरूम की खेती कैसे होती है (Mushroom Ki Kheti Kaise Hoti Hai)? कैसे हम इस फसल से कमाई कर सकते हैं। अगर आप एक छोटे किसान है तो यह जानकारी आपके लिए बहुत अच्छी साबित होने वाली है। इसलिए आप इसे ध्यान से पढिए।

मशरूम क्या है?

एक छतरीनुमा पौधा जो रेतीली मिट्टी, गोबर की खाद, लकड़ी के ढेर आदि में ऊगता है। हालांकि इसे पौधा कहना उचित नहीं है, क्योंकि यह एक कवक की श्रेणी में आता है। पहले इसे पौधों की श्रेणी में रखा जाता था। लेकिन हल ही में हुई शोधों से पता चलता है कि यह एक पौधा न होकर कवक है।

पौधे वे होते हैं जो सूर्य की रोशनी से अपना भोजन प्राप्त करते हैं। लेकिन मशरूम ऐसे नहीं करती है। मशरूम अपना भोजन कार्बनिक पदार्थों से प्राप्त करता है। इन कार्बनिक पदार्थों में खाद, गोबर, पुआल, सुखी लकड़ी आदि आते हैं। आपने भी बारिश के मौसम में ऐसे पौधों को अपने आस-पास जरूर देखा होगा।

मशरूम की कोशिका भित्ति पौधों और जानवरों से अलग होती है। इस कारण वैज्ञानिकों ने इसे कवक की श्रेणी में रखा है। दुनियाभर में भारी संख्या में कवक पाए जाते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में 15 लाख से भी ज्यादा प्रकार के कवक पाए जाते हैं। जिनमें से अभी तक लगभग 1 लाख कवक के बारे में जानकारी प्राप्त हुई है।

इन कवकों में से 14000 प्रकार के मशरूम पाए जाते हैं। हालांकि यह सभी खाने योग्य नहीं है, क्योंकि इनमें से ज़्यादातर जहरीले होते हैं। इन 14000 मशरूम की प्रजातियों में से सिर्फ 3000 प्रजातियाँ खाने योग्य है। हालांकि इन सभी प्रजातियों का उत्पादन करना संभव नहीं है। लेकिन फिर भी 250 प्रजाति ऐसी है, जिनकी खेती करना संभव है।

इन 250 प्रजातियों में से सिर्फ 60 प्रजातियों की व्यावसायिक खेती की जाती है। भारत में मशरूम की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। इसका सबसे बड़ा कारण यहाँ की भूमि और जलवायु है। उत्तरी भारत में मशरूम की खेती करना बहुत आसान है।

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मशरूम की आवश्यकता क्यों है?

आज से 300 वर्ष पूर्व इंसान एक ऐसी स्थिति में फंसा हुआ था। जहां उसे भर पेट भोजन करने के लिए भी तरसना पड़ता था। वो एक ऐसा समय था, जब खाने के लिए पृथ्वी पर इतना भोजन नहीं था। परंतु आज इसके बिल्कुल विपरीत है, क्योंकि दुनियाभर में आज भारी मात्रा में खाद्य पदार्थों का उत्पादन किया जाता है।

इसी कारण आज हम भर पेट खाने की बजाय उस खाने का चयन कर रहे हैं जो हमारे शरीर के लिए healthy हो। इसके अलावा हमारे शरीर के लिए आवश्यक कैलोरी की भी पूर्ति करता हो। मशरूम इसके लिए सबसे उत्तम है, क्योंकि यह पौष्टिक तत्वों से भरा हुआ खाद्य पदार्थ है।

मशरूम न केवल एक गुणवता से भरा हुआ भोजन है, बल्कि कचरे से खेती कर पैसे कमाने का एक उन्नत तरीका भी है। मशरूम की खेती करने के बाद बचे हुए पदार्थ से खाद बनाई जा सकती है। इस बचे हुए पदार्थ को मशरूम सब्सट्रेट के नाम से भी जाना जाता है। इस तरह से महशरूम की खेती करने के बाद जमीन की उपजाऊ क्षमता बढ़ जाती है।

मशरूम की खेती अपशिष्ट पदार्थों पर की जाती है, इस कारण हमें इससे दो फायदे हो रहे हैं। पहला फायदा यह है कि हम एक पौष्टिक भौजान का उत्पादन कर रहे है। और दूसरा फायदा यह है कि इससे एक स्वस्थ वातावरण का निर्माण हो रहा है। क्योंकि अपशिष्ट पदार्थ गलकर जमीन में मिल जाते है।

मौजूदा समय में मशरूम की खेती ने रोजगार को भी बढ़ावा दिया है। वर्तमान समय में बढ़ती जनसंख्या ने खेती योग्य भूमि को कम कर दिया है। जिससे खेती करना थोड़ा मुश्किल हो रहा है। परंतु मशरूम की खेती ने इस समस्या को दूर कर दिया है। आप कहीं भी इसकी खेती कर सकते हैं और अच्छा-खासा मुनाफा कमा सकते है। इसके अलावा मशरूम की खेती के कुछ अन्य फायदे भी है-

  • हाल ही में किसानों द्वारा पराली जलाने का मामला सामने आया था। सरकार और विशेषज्ञों के अनुसार पराली जलाने से वायु प्रदूषण होता है। लेकिन अगर किसान उस पराली में मशरूम की खेती करे तो इस समस्या से छुटकारा मिल सकता है।
  • मशरूम एक नकदी फसल है, जो किसानों की आय बढ़ाने में सक्षम है। इसका मुख्य कारण बाजार में बढ़ती इसकी मांग है।
  • मशरूम की खेती के लिए आपको खेत की आवश्यकता नहीं होती है। इस कारण वो लोग भी इसकी खेती कर सकते हैं जिनके पास जमीन नहीं है।
  • मशरूम पौष्टिक तत्वों से भरा हुआ भोजन है, इस कारण किसान एक स्वस्थ विश्व का निर्माण कर रहे हैं।

मशरूम की खेती कैस होती है (Mushroom Ki Kheti Kaise Hoti Hai)?

भारत में मुख्य रूप से चार प्रकार की मशरूम की खेती होती है। यह मशरूम बटन, दूधिया, ऑएस्टर और धान पुआल के नाम से जानी जाती है। इसमें सबसे ज्यादा बटन मशरूम की खेती की जाती है। खासकर उत्तर-पश्चिमी भारत में बटन मशरूम की खेती करना बहुत आसान है, इस कारण इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा इसी की खेती की जाती है।

बटन मशरूम की खेती

बटन मशरूम भारत की सबसे लोकप्रिय मशरूम है, बाजार में मिलने वाली मशरूम आमतौर पर यही होती है। इस मशरूम की खेती करना बहुत आसान है, जिससे यह किसानों की पहली पसंद है। इस मशरूम का उत्पादन पौधों के अवशेषों को खाद बनाकर किया जाता है।

बटन मशरूम का सबसे ज्यादा उत्पादन उत्तरी भारत में सबसे ज्यादा किया जा रहा है। उत्तरी भारत के राज्यों- हरियाणा, पंजाब, पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इसकी खेती सबसे ज्यादा की जाती है। इन राज्यों के छोटे-छोटे गांवों से बटन मशरूम को मेट्रो शहरों तक पहुंचाया जाता है, जहां इनकी अच्छी कीमत मिलती है।

विज्ञान की भाषा में श्वेत बटन मशरूम को एगेरिकस बाइस्पोरस के नाम से जाना जाता है। आंकड़ों के अनुसार संसार में इस मशरूम का सबसे ज्यादा उत्पादन किया जाता है। बटन मशरूम की खेती करने के लिए कुछ स्टेप्स फॉलो करने पड़ते है, जो इस प्रकार से है।

कम्पोस्ट बनाना

कम्पोस्ट मशरूम की खेती (Mushroom Ki Kheti Kaise Hoti Hai) का आधार है। मशरूम की उत्पादन क्षमता इसी कम्पोस्ट पर निर्भर करती है, अगर कम्पोस्ट बेहतरीन होगा तो उत्पादन भी बेहतरीन होगा। लेकिन अगर कम्पोस्ट कम गुणवता का हुआ तो उत्पादन में भारी कमी आ सकती है।

  • खाद दो तरीकों से बनाई जाती है- प्राकृतिक खाद और संश्लेषित खाद।
  • प्राकृतिक खाद घोड़े की लीद से बनाई जाती है, जिसे अस्तबलों से इकट्ठा करना पड़ता है।
  • चूंकि वर्तमान समय में घोड़ों की संख्या कम होने के कारण बड़े पैमाने पर ऐसी खाद बनाना संभव नहीं है।
  • संश्लेषित खाद में अनाज के भूसे और अन्य रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है।
  • इस लेख में हम सिर्फ संश्लेषित खाद को ही बनाना सीखेंगे।

मशरूम की खेती में कम्पोस्ट धान, गेहूं या किसी दूसरे अनाज के भूसे और अन्य पदार्थों के मिश्रण से बनाया जाता है। इसे एक निश्चित विधि से तैयार करना पड़ता है। जिसके लिए इस मिश्रण को लंबे समय तक सड़ाया-गलाया जाता है। ऐसा करने से मशरूम के लिए एक आदर्श वातावरण का निर्माण होता है।

कम्पोस्ट बनाने से बीज को प्राप्त मात्रा में हवा और पानी मिलता रहता है, क्योंकि शुद्ध हवा की कमी के कारण बीज के मरने का खतरा बना रहता है। इसके अलावा इससे अम्लीयता और क्षारीयता को नियंत्रित किया जा सकता है और बीज के ऊगने के लिए एक ठंडे वातावरण का निर्माण होता है।

कम्पोस्ट बनाने की तकनीक

मशरूम की खेती के लिए कम्पोस्ट बनाने का कार्य थोड़ा मुश्किल है। खासकर उन किसानों के लिए जो पहली बार मशरूम की खेती कर रहे हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि मशरूम के प्रकार की फफूंद होती है। जब हम कम्पोस्ट बनाते है तो वो अन्य फफूंद के पनपने का माध्यम बन जाता है।

यानी कम्पोस्ट को इस तरीके से बनाया जाता है, ताकि उसमें सिर्फ मशरूम की ही पैदावार हो। अगर कम्पोस्ट अन्य जीवाणुओं और फफूंदों के लिए अनुकूल हो गई तो पूरी की पूरी खेती खराब हो सकती है। इस तरह की कम्पोस्ट एक लंबे अनुभव के बाद ही बनाई जा सकती है, परंतु आप हमारे द्वारा बताए गए तरीके से एक आदर्श कम्पोस्ट को तैयार कर सकते हैं।

  • खाद/कम्पोस्ट बनाने के लिए अनाज के भूसे का उपयोग किया जाता है।
  • इसमें सबसे ज्यादा गेंहू की तुड़ी से खाद बनाई जाती है, क्योंकि यह आसानी से कहीं भी मिल जाती है।
  • इसके अलावा जहां चावल की खेती सबसे ज्यादा होती है, वहाँ चावल के भूसे का इस्तेमाल किया जाता है।
  • अगर चावल और गेंहू का भूसा न मिले तो जाई, जौ, ज्वार, बाजरा आदि के भूसे को खाद के लिए तैयार किया जा सकता है।

खाद बनाने के लिए सामग्री

गेंहू का भूसा

गेहूं का भूसा या तूड़ी खाद के बनाने के लिए सबसे उत्तम मानी जाती है। इसका मुख्य कारण भारत में इसकी प्रचूर उपलब्धता का होना है। ताजा पीले रंग और 2 इंच लंबी तूड़ी का इस्तेमाल करने से खाद की गुणवता बढ़ती है। साथ ही इस बात का अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि तूड़ी गीली और एक वर्ष से ज्यादा पुरानी नहीं होनी चाहिए।

धान का भूसा

अगर कहीं गेहूं के भूसे मिलने में कोई समस्या आ रही हो तो इसकी जगह धान के भूसे का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। ताजा, सूखा, 2 इंच लंबा भूसा उपयोग में लिया जाता है।

घोड़े की लीद

घोड़े की लीद मशरूम की खेती के लिए सर्वोत्तम है, विश्व के अन्य देशों खासकर ब्रिटेन में खाद इसी से तैयार की जाती है। परंतु भारत में ऐसा करना थोड़ा मुश्किल है। क्योंकि आजादी के बाद में भारत में घोड़ों की संख्या लगातार कम हुई है।

पशु मलमूत्र

इनमें मुर्गी, सूअर, भेड़-बकरियाँ, गाय, बैल आदि के मलमूत्र को खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इनमें नाइट्रोजन की मात्रा 1-2% के बीच होती है। इनमें सबसे ज्यादा मुर्गी की खाद लाभदायक होती है।

कार्बोहाइड्रेट

इनमें मुख्य तौर पर शीरा, ब्रूयर्स ग्रेन, आलू का अपशिष्ट पदार्थ, चुकंदर का गुदा, मल्ट स्प्राउट आदि को काम में लिया जाता है।

नाइट्रोजन से भरपूर सामग्री

इसमें अमोनियम नाइट्रेट, अमोनियम सल्फेट, कैल्सियम अमोनिया नाइट्रेट और यूरिया मुख्य है। इन रसायनों में नाइट्रोजन की प्रचूर मात्रा पाई जाती है।

पशु आहार

सोर्स- कृषि विज्ञान केंद्र

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