नाटो क्या है (Nato Kya hai) और यह कैसे काम करता है?

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नाटो क्या है? (Nato Kya hai)

नाटो क्या है (Nato Kya hai) और यह कैसे काम करता है?

North Atlantic Treaty Organization (NATO) 4 अप्रैल, 1949 की उत्तरी अटलांटिक संधि (जिसे वाशिंगटन संधि भी कहा जाता है) द्वारा स्थापित एक सैन्य गठबंधन है। इसने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद मध्य और पूर्वी यूरोप में तैनात सोवियत सेनाओं के लिए एक चुनौती के रूप में काम करना शुरू किया था।

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इसके मूल सदस्य बेल्जियम, कनाडा, डेनमार्क, फ्रांस, आइसलैंड, इटली, लक्जमबर्ग, नीदरलैंड, नॉर्वे, पुर्तगाल, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका थे। इसके अलावा इसमें शामिल होने वाले सदस्य देश ग्रीस और तुर्की (1952), पश्चिम जर्मनी (1955), स्पेन (1982), Czech गणराज्य, हंगरी और पोलैंड (1999), बुल्गारिया, एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया, रोमानिया, स्लोवाकिया और स्लोवेनिया (2004), अल्बानिया और क्रोएशिया (2009),  मोंटेनेग्रो (2017) और उत्तर मैसेडोनिया (2020) है।

नाटो क्या है (Nato kya hai)?

फ्रांस 1966 में नाटो की एकीकृत सैन्य कमान से हट गया लेकिन संगठन का सदस्य बना रहा। इसने 2009 में नाटो की सैन्य कमान में अपनी स्थिति फिर से शुरू की। नाटो की संधि में अनुच्छेद 5 को इसका सबसे प्रमुख हथियार माना गया है। इस अनुच्छेद के अनुसार-

“यूरोप और उत्तरी अमेरिका में स्थित किसी भी देश के खिलाफ अगर कोई सशस्त्र हमला होता है, तो उस हमले को उन सभी के खिलाफ हमला माना जाएगा जो नाटो में शामिल है। इसके परिणामस्वरूप सभी सदस्य इस बात से सहमत हैं कि यदि ऐसा सशस्त्र हमला होता है, तो उनमें से प्रत्येक संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 द्वारा मान्यता प्राप्त व्यक्तिगत या सामूहिक आत्मरक्षा के अधिकार का प्रयोग करते हुए उस देश की सहायता करेगा जिस पर इस प्रकार हमला किया गया है। इसके अलावा उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र की सुरक्षा को बनाए रखने के लिए सशस्त्र बलों का  उपयोग किया जा सकता है।

आतंकी ओसामा बिन लादेन द्वारा करवाए गए 11 सितंबर के हमलों के बाद, नाटो ने 2001 में पहली बार अनुच्छेद 5 को लागू किया था। लादेन के इस आतंकी हमले में न्यूयॉर्क शहर का वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और वाशिंगटन डीसी के बाहर पेंटागन के हिस्से को क्षतिग्रस्त किया गया था। इस हमले में लगभग 3,000 लोग मारे गए थे।

अनुच्छेद 6 संधि के भौगोलिक दायरे “यूरोप या उत्तरी अमेरिका में किसी भी पक्ष के क्षेत्र पर एक सशस्त्र हमले” को कवर करने के रूप में परिभाषित करता है। अन्य अनुच्छेदों में सहयोगियों को अपने लोकतांत्रिक संस्थानों को मजबूत करने, अपनी सामूहिक सैन्य क्षमता का निर्माण करने, एक-दूसरे से परामर्श करने और अन्य यूरोपीय राज्यों को शामिल होने के लिए प्रतिबद्ध करते हैं।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पश्चिमी यूरोप आर्थिक रूप से काफी कमजोर हो गया था। युद्ध में भारी क्षति होने के कारण यूरोप सैन्य रूप से भी कमजोर था (पश्चिमी मित्र राष्ट्रों ने युद्ध के अंत में अपनी सेनाओं को तेजी से कम कर दिया था)। इस समय फ्रांस और इटली में नए शक्तिशाली कम्युनिस्ट दलों का उदय हुआ।

इसके विपरीत सोवियत संघ मध्य और पूर्वी यूरोप के सभी राज्यों में अपनी सेना का प्रभुत्व जमाने लगा था। इसके परिणामस्वरूप 1948 तक सोवियत संघ ने इन देशों की सरकारों पर अपना नियंत्रण मजबूत कर लिया था और सभी गैर-साम्यवादी राजनीतिक गतिविधियों को दबा दिया था।

इस घटना को आयरन कर्टन (Iron Curtain) के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा पश्चिमी मित्र राष्ट्रों और सोवियत संघ के बीच युद्धकालीन सहयोग पूरी तरह से टूट चुका था। प्रत्येक पक्ष अपने कब्जे वाले जर्मनी के ऊपर अपना अधिकार जमाने लगा। ताकि दो जर्मन राज्य उभर सकें, पश्चिम में एक लोकतांत्रिक और पूर्व में एक कम्युनिस्ट।

1948 में संयुक्त राज्य अमेरिका ने मार्शल योजना की शुरूआत की। इस योजना के तहत पश्चिमी और दक्षिणी यूरोप के देशों को भारी मात्रा में आर्थिक सहयोग किया गया। यह सहयोग इस शर्त पर था कि वे एक दूसरे के साथ संबद्धों को मजबूत करें और एक दूसरे का किसी भी संकट में सहयोग करें। इस संधि को ब्रुसेल्स संधि के नाम से जाता है।

1948 की ब्रुसेल्स संधि के तहत यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, बेल्जियम, नीदरलैंड और लक्ज़मबर्ग ने पश्चिमी यूरोपीय संघ नामक एक सामूहिक-रक्षा समझौता किया। परंतु फिर भी सोवियत संघ को रोकने के लिए एक मजबूत सैन्य बल की आवश्यकता थी।

इस समय तक ब्रिटेन, कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका अपनी सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए एक गुप्त वार्ता में लगे हुए थे। जो संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के विकल्प के रूप में काम करेगा। इस तरह से धीरे-धीरे शीट युद्ध की शुरुआत हो रही थी।

मार्च 1948 में चेकोस्लोवाकिया में एक कम्युनिस्ट सरकार का तख्तापलट हुआ। इसके बाद ब्रिटेन, कनाडा और अमेरिका ने एक बहुपक्षीय सामूहिक-रक्षा योजना पर काम करना शुरू किया जो पश्चिमी सुरक्षा को बढ़ाएगी और लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देगी।

इसके परिणामस्वरूप फ्रांस, यूरोप के छोटे देश और नॉर्वे ने इसमें अपनी रुचि दिखाई। इस तरह से अप्रैल 1949 में उत्तरी अटलांटिक संधि हुई। जिसे आज NATO के नाम से जाना जाता है। उस समय इसका मुख्य उद्देश्य सोवियत संघ पर लगाम लगाना था।

संगठन

जून 1950 में दक्षिण कोरिया पर उत्तर कोरिया के आक्रमण को देखकर संयुक्त राज्य अमेरिका ने बहुत अहम कदम उठाएँ। इन फैसलों के अनुसार USA यूरोप में किसी भी सोवियत सैन्य विस्तार या दबाव का विरोध करेगा, जो सोवियत द्वारा किया जाएगा।

द्वितीय विश्व युद्ध में पश्चिमी यूरोप में मित्र देशों की सेना के नेता जनरल ड्वाइट डी. आइजनहावर (General Dwight D. Eisenhower) को दिसंबर 1950 में उत्तरी अटलांटिक परिषद (नाटो परिषद) द्वारा सुप्रीम एलाइड कमांडर यूरोप (SACEUR) नामित किया गया था।

उत्तरी अटलांटिक परिषद जिसे संधि के प्रभाव में आने के तुरंत बाद स्थापित किया गया था। यह परिषद सदस्य देशों के मंत्री प्रतिनिधियों से बना था, जो साल में कम से कम दो बार मिलते हैं। नाटो में जिस तरह SACEUR का पद हमेशा एक अमेरिकी के पास रहा है, उसी तरह महासचिव का पद हमेशा एक यूरोपीय के पास रहा है।

नाटो के सैन्य संगठन में संभावित युद्ध की स्थिति में उपयोग के लिए आदेशों की एक पूरी प्रणाली शामिल है। युद्ध की संभावित स्थिति में सैन्य समिति सदस्य राज्यों के कर्मचारियों के सैन्य प्रमुखों के प्रतिनिधियों से मिलकर दो रणनीतिक आदेशों को पारित करते हैं: एलाइड कमांड ऑपरेशंस (एसीओ) और एलाइड कमांड ट्रांसफॉर्मेशन (एसीटी)।

ACO का नेतृत्व SACEUR करता है और इसका मुख्यालय बेल्जियम के Casteau में सुप्रीम हेडक्वार्टर एलाइड पॉवर्स यूरोप (SHAPE) में स्थित है। ACT का मुख्यालय नॉरफ़ॉक, वर्जीनिया (यूएस) में है। गठबंधन के पहले 20 वर्षों के दौरान  नाटो को मजबूत बनाने के लिए तकरीबन 3 बिलियन डॉलर की राशि खर्च की गई थी।

इस राशि का उपयोग NATO के ठिकानों, हवाई क्षेत्रों, पाइपलाइनों, संचार नेटवर्क, डिपो के “बुनियादी ढांचे” को शक्तिशाली बनाने के लिए किया गया था। संयुक्त राज्य अमेरिका ने इस राशि का लगभग एक तिहाई नाटो में वितरित किया था।

नाटो की फंडिंग का उपयोग आम तौर पर सैन्य उपकरणों की खरीद के लिए नहीं किया जाता है। हालांकि नाटो एयरबोर्न अर्ली वार्निंग फोर्स, रडार से लैस विमानों का एक बेड़ा जो अचानक से होने वाले हमले से बचाने के लिए डिज़ाइन किया गया था। यह सब संयुक्त रूप से फंडिंग के द्वारा ही बनाया जाता है।

जर्मनी की भूमिका

Nato kya hai- 1950 के दशक के मध्य में जब द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो गया था, तब नाटो के सामने एक गंभीर समस्या उभरकर सामने आई। इस समस्या में नाटो को पश्चिमी जर्मनी को अपना भागीदार बनाना था। एक देश जिसने पूरी दुनिया को एक विश्वयुद्ध में धकेला और उसे अब नाटो में शामिल करना।

चूंकि हिटलर की मृत्यु के बाद जर्मनी का पुनर्गठन हुआ, लेकिन पश्चिमी यूरोप ने जर्मनी का नाटो में स्वागत बड़ी हिचकिचाहट और बैचेनी के साथ किया। लेकिन उन्हें यह करना भी जरूरी था, क्योंकि सोवियत आक्रमण से यूरोप को केवल जर्मनी ही बचा सकता था। इस कारण यूरोप ने जर्मनी को और मजबूत बनाने का फैसला किया।

तदनुसार नाटो में जर्मनी की एंट्री की शुरुआत अक्टूबर, 1954 के पैरिस समझौते से हुई। इस समझौते के अनुसार पश्चिमी जर्मनी पर अब सभी देशों का कब्जा समाप्त हो जाएगा। साथ ही जर्मनी को एक निश्चित सीमा में सेना और शासन वापिस दिया गया।

इसके बाद मई, 1955 में पश्चिमी जर्मनी नाटो में शामिल हुआ, जिसने सोवियत संघ को वारसॉ संधि गठबंधन बनाने के लिए प्रेरित किया। शीत युद्ध समाप्त होने तक लगभग 9,00,000 सैनिक (उनमें से लगभग छह देशों संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, बेल्जियम, कनाडा और नीदरलैंड्स के आधे से ज्यादा सैनिक) पश्चिम जर्मनी में तैनात थे।

फ्रांस की भूमिका

नाटो के साथ फ्रांस के संबंध 1958 के बाद तनावपूर्ण हो गए, क्योंकि राष्ट्रपति फ़्रांसी चार्ल्स डी गॉल ने संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा संगठन के वर्चस्व और नाटो के कई अंतरराष्ट्रीय कर्मचारियों और गतिविधियों द्वारा फ्रांसीसी संप्रभुता से छेड़छाड़ की आलोचना की।

उन्होंने तर्क दिया कि इस तरह के “एकीकरण” ने विदेशियों के हस्तक्षेप ने फ्रांस को गृह युद्ध के अधीन कर दिया था। जुलाई, 1966 में फ्रांस ने औपचारिक रूप से नाटो से अलग होने का ऐलान कर दिया और नाटो को अपनी धरती छोड़ने के लिए निर्देश दिए।

इसके बाद नाटो ने अपना मुख्यालय पेरिस से ब्रसेल्स (Brussels) में स्थानांतरित कर लिया। लेकिन फ्रांस पूरी तरह से नाटो से अलग नहीं हुआ। उसने नाटो सैन्य कर्मचारियों से संबंध बनाए रखा, बैठकों में हिस्स लिया और पश्चिमी जर्मनी में अपने सैनिकों को जमाए रखा। लेकिन 2009 में फ्रांस फिर से नाटो में शामिल हो गया।

शीट युद्ध के दौरान नाटो

नाटो की स्थापना के बाद से ही इसका उद्देश्य सोवियत संघ और वारसॉ संधि में शामिल देशों (सोवियत संघ, पूर्वी यूरोप और पूर्वी जर्मनी) के आक्रमण से पश्चिमी देशों को बचाना था। 1950 के दशक तक नाटो अमेरिका के परमाणु हथियारों पर निर्भर था, उसे यह विश्वास था कि अगर उन पर हमला हुआ तो अमेरिका इसका जवाब परमाणु हमलों से देगा।

इसके बाद साल 1957 में पश्चिमी यूरोप में अमेरिका ने बड़े पैमाने पर परमाणु हथियारों की तैनाती की। लेकिन नाटो ने बाद में विश्व शांति के लिए एक ‘लचीली रणनीति’ अपनाई। क्योंकि अगर कोई भी परमाणु युद्ध होता है, तो सबसे ज्यादा नुकसान पूरे यूरोप को ही होगा।

नाटो में काम करने वाली कई सेनाएँ परमाणु हथियारों से लैस थी। जिन पर दोहरा नियंत्रण था, एक खुद का और दूसरा अमेरिका का। इस तरह से परमाणु बम का कब और कैसे उपयोग करना है, यह सिर्फ अमेरिका पर निर्भर था। लेकिन ब्रिटेन ने अपने परमाणु हथियारों पर नियंत्रण रखा और फ्रांस का पूरी तरह से परमाणु ताकत पर नियंत्रण था।

इसके बाद दोनों पक्षों (नाटो और सोवियत संघ) के बीच एक पारंपरिक और परमाणु गतिरोध 1960 के दशक की शुरुआत में बर्लिन की दीवार के निर्माण, 1970 के दशक में डिटेंटे, 1980 के दशक में सोवियत संघ के अफगानिस्तान पर आक्रमण, 1979 के चुनाव के बाद शीत युद्ध के तनाव और 1980 में अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के कारण जारी रहा।

हालांकि 1985 के बाद सोवियत नेता मिखाइल गोर्बाचेव द्वारा शुरू किए गए दूरगामी आर्थिक और राजनीतिक सुधारों ने मौलिक रूप से यथास्थिति को बदल दिया। जुलाई 1989 में गोर्बाचेव ने घोषणा की कि मास्को अब मध्य और पूर्वी यूरोप में कम्युनिस्ट सरकारों का समर्थन नहीं करेगा।

इस तरह से मध्य और पूर्वी यूरोप पर सोवियत संघ का पूरी तरह से नियंत्रण खत्म हो गया। जिसके परिणामस्वरूप 1991 में वारसॉ संधि का अंत हुआ। इस घटना ने नाटो के अस्तित्व के लिए भी खतरे की घंटी बजा दी, क्योंकि अब लोग इस संगठन पर सवाल उठाने लग गए थे। उनका यह तर्क था कि अब पश्चिमी यूरोप पर कोई खतरा नहीं है।

लेकिन आज भी नाटो अपने अस्तित्व में है और यह अपना काम भली-भांति कर रहा है। नाटो ने एक तरह से पश्चिमी देशों को सुरक्षा प्रदान की और दूसरी तरफ वैश्विक अशांति में अहम योगदान दिया।

निष्कर्ष

तो दोस्तों यह था नाटो क्या है (Nato kya hai) आर्टिक्ल। जिसमें हमने जाना कि नाटो क्या है? (Nato Kya hai) और यह कैसे काम करता है? आखिर नाटो को बनाने का क्या कारण था? वैसे नाटो इतिहास में सबसे शक्तिशाली संगठनों में से एक है, जो वर्तमान में सबसे खतरनाक संगठन माना जाता है।

नाटो क्या है? (Nato Kya hai) सवाल से जुड़े अगर आपके मन में कोई भी सवाल हो तो आप हमें comment कर के जरूर बताएं। आपको यह आर्टिक्ल कैसा लगा इसके बारे में हमें अपना फीडबैक जरूर दें।


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